Wed Aug 11 2010 22:21:06 GMT+0530 (India Standard Time)
कॉमनवेल्थ गेम्स में हर गुज़रते वक़्त के साथ इस धांधली से जुड़े नए-नए खुलासे हो रहे हैं। संसद में रोज़ाना इसी पर बहस हो रही है। विपक्ष इल्ज़ाम लगा रहा है और सरकार सफाई दे रही है। दूसरी तरफ कलमाड़ी अपने बचने के रास्ते ढूंढ रहे हैं, लेकिन इन सब के बीच में दिल्ली सरकार बेफिक्र दिखती है। बारात घर के बाहर पहुंचने वाली है और घर में कूड़ा पड़ा हुआ। खिलाड़ियों के साथ तो ग़ज़ब का धोखा हो रहा है। उनके लिए इनामों में कटौती की जा रही है, यानी हर तरफ बस करप्शन ही दिखता है...
गिल है कि मानता नहीं!
गिल साहब हैं कि मानते ही नहीं। शुरुआत से ही सफाई पर सफाई दिए जा रहे हैं। एक ही बात हर बार दोहराते हैं, लेकिन इस बार उन्होंने ऐसा कुछ बोला कि बीजेपी नाराज़ हो गई और लोक सभा का बहिष्कार करते हुए बाहर निकल गई। लोकसभा में सोमवार को आक्रामक रुख में दिख रही कांग्रेस मंगलवार को बैकफुट पर दिखी। कॉमनवेल्थ गेम्स में गड़बड़ी को लेकर विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए खेल मंत्री एम.एस. गिल खड़े हुए, लेकिन जब उन्होंने बोलना शुरू किया, तो ऐसा लगने लगा कि भ्रष्टाचार के आरोप में घिरी आयोजन समिति सरकार के लिए गले की हड्डी बन गई है, जो ना निगलते बन रही है ना ही उगलते। गिल साहब विपक्ष से कहते रहे कि जो हो गया वह हो गया। फिलहाल देश की इज्ज़त पर राष्ट्रमंडल खेलों को सफल बनाने पर ध्यान देना चाहिए। विपक्ष यह सफाई शांत होकर सुन रहा थी, लेकिन बोलते-बोलते गिल कह गए कि अगर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर किसी को कोई जानकारी चाहिए तो सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। ऐसा कहना था कि बीजेपी बिफर पड़ी और नेता प्रतिपक्ष सुष्मा स्वराज ने इसे सदन की अवमानना करार देते हुए वॉक आउट कर दिया।
बीजेपी के तेवर बताते हैं कि वे किसी भी हाल में इस मुद्दे पर समझौता नहीं चाहते। बीजेपी पहले भी पूरे गोरख धंधे की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति की मांग कर चुकी है। जब से संसद में राष्ट्रमंडल खेलों में घोटाले का मुद्दा उठा है तभी से खेल मंत्री लगातार सफाई दे रहे हैं। कभी वे आक्रामक रवैया अपनाते हैं और कभी बैकफुट पर चले जाते हैं, लेकिन उनका रुख कलमाड़ी के ख़िलाफ़ कभी नहीं रहा। ज़ाहिर है कलमाड़ी एंड टीम को गिल सहित पूरी कांग्रेस पार्टी की शह मिली हुई है।
इमोशनल भ्रष्टाचार!
जहां एक तरफ पूरा विपक्ष कलमाड़ी से जवाब मांग रहा है, वहीं कलमाड़ी सांसदों को चिट्ठी लिख रहे हैं। सांसदों को ख़त लिखकर कलमाड़ी उन्हें अपने कॉन्फिडेंस में लेना चाहते हैं। साथ ही वे धांधली की ज़िम्मेदारियां दूसरों के सिर पर भी डालना चाहते हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स ऑर्गेनाइज़िंग कमेटी के अध्यक्ष कलमाड़ी को अब लगने लगा है कि वे घिर चुके हैं और पार्टी के भीतर भी उनके खिलाफ उथल-पुथल होने लगी है। लिहाज़ा उन्होंने अब सांसदों को चिट्ठी लिखकर सफाई देनी शुरू कर दी है। एक तरह से कहा जाए कि सुरेश कलमाड़ी इमोशनली सांसदों के सपोर्ट की फिराक में हैं और इसीलिए उन्होंने 14 बिंदुओं वाला एक ख़त कुछ सांसदों को भेजा है और कहा है कि मैं किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार हूं।
लंदन क्वींस बैटन रिले में हमने कम से कम खर्च किया। हमारे पास 13.13 करोड़ का बजट था, जबकि 5.5 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। लंदन पुलिस के कहने पर विडियो स्क्रीन लगाए गए, इसके लिए 1.2 करोड़ रुपयों की ज़रूरत थी
और सभी से मंज़ूरी लेने के बाद ही भुगतान किया गया। ए एम कार्स एंड वैन और संजय महेंद्रू के बीच क्या करार हुए उससे हम अनभिज्ञ थे। खेल को सफल बनाने में मेरा सहयोग करें। कलमाड़ी ने एक तरह से इस चिट्ठी के ज़रिए लंदन क्वींस बैटन रिले के दौरान हुई धांधली का ज़िम्मेदार संजय महेंद्रू को ठहरा दिया है। हालांकि कलमाड़ी के लिए महज़ यह चिट्ठी काफी नहीं होगी।
तारीख पर तारीख
केंद्र सरकार कहती है कि दिल्ली मेहमानों के स्वागत के लिए तैयार है, लेकिन राजधानी मलबों के ढेर से पटी पड़ी है। शीला दीक्षित ने 10 अगस्त तक इन मलबों को हटा लेने का वादा किया था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हालांकि तारीख पर तारीख ज़रूर मिल रही है। खेल मंत्री को यह कैसी चिंता है इन्हें पता है। सरकार को पता है कि 35 दिन रह गए हैं, जब विदेशों हज़ारों मेहमान दिल्ली में कदम रखने लगेंगे, लेकिन क्या दिल्ली सरकार को यह पता है।
ऐसा लगता तो नहीं, क्योंकि अभी भी दिल्ली के कोने-कोने में तमाम जगहों पर मलबे का ढेर पड़ा हुआ है। कई प्रोजेक्ट्स अधूरे हैं। क्या हम अपने मेहमानों को यह मलबे दिखाने वाले हैं? दिल्ली की मुख्यमंत्री ने शान से कहा था कि 10 अगस्त तक सारे मलबे साफ कर दिए जाएंगे, लेकिन अब जब यह तारीख ख़त्म हो गई, तो शीलाजी कोई नई तारीख तो नहीं दे रहीं, लेकिन सफाई ज़रूर पेश कर रही हैं। सीएम साहिबा का एक और आश्वासन भले उन्होंने तारीख नहीं दी, लेकिन उनके नुमाइंदे एक और नई तारीख दे रहे हैं। वह भी एमसीडी, पीडब्ल्यूडी, सीपीडब्ल्यूडी, एनडीएमसी की आड़ लेते हुए।
ऐसे में सवाल यह है कि दिल्ली सरकार कब तक तारीख पर तारीख देती रहेगी, जबकि 35 दिनों में ही मेहमान आने लगेंगे। तमाम ऐसे प्रोजेक्ट हैं जो अधूरे हैं और वे शायद 31 अगस्त तक पूरे न हों। क्या तब भी शीला दीक्षित यही कहेंगी कि जहां सड़क, घर और इमारत बनेगी वहां मलबा तो होगा ही।