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Thu Aug 12 2010 22:08:17 GMT+0530 (India Standard Time)

कॉमनवेल्थ से कांग्रेस के तमाम नेता अपना वेल्थ बना रहे हैं और ऐसा करने के लिए पूरा ब्लू प्रिंट बनाया गया था, जिसमें आगे की पूरी योजना बनाई गई थी और इसके बीच में जो भी आया उसे हटा दिया गया। ये वह करप्शन वेल्थ गेम्स की फेमिली है, जिसने हर काम से रुपया बनाया और एक दूसरे को ऐसे सपोर्ट कर रहे हैं जैसे कह रहे हों We Are Family।

शायद आपको पता न हो, लेकिन जिस आयोजन समिति पर सवाल उठ रहे हैं। उसके ऊपर भी एक कमेटी थी। एपेक्स कमेटी और इस कमेटी में शुरुआत में राहुल गांधी जैसी शख़्सियत थी, लेकिन यह कमेटी वक़्त के साथ कहां गुम हो गई पता ही नहीं चला।

1982 के एशियाड के दौरान भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी की अगुवाई में एक ऐसी ही कमेटी बनाई थी और एशियाड बिना किसी विवाद के सफलता पूर्वक आयोजित हुआ और ओलम्पियाड ने भी इसकी तारीफ की। ज़ाहिर है मौजूदा वक़्त में ऐसी एपेक्स कमेटी होती, तो शायद ऐसा घोटाला न होता। पूर्व खेल मंत्री और कांग्रेस सांसद मणिशंकर अय्यर ने 5 अगस्त को ही राज्यसभा में मौजूदा खेल मंत्री एम.एस.गिल से एक ऐसी ही कमेटी बनाने की मांग की थी, लेकिन इसे ठुकरा दिया गया। क्या वजह थी कि मणिशंकर अय्यर को सिर्फ एक ई-मेल देकर खेल मंत्री के पद से हटा दिया गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि काफी पहले घोटालों को महसूस कर चुके अय्यर से घपलेबाज़ों को ख़तरा महसूस होने लगा था।

यह बात चार साल पुरानी है। उस वक़्त सुनील दत्त के देहांत के बाद मणिशंकर अय्यर खेल मंत्री बने थे और साथ में उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स एपेक्स कमेटी का भी चार्ज मिला था। अय्यर ने उसी वक़्त कॉमनवेल्थ गेम्स ऑर्गेनाइज़िंग कमेटी के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी पर फिजूलखर्ची को लेकर उंगली उठाई थी। उसी दौरान मेलबर्न कॉमनवेल्थ गेम्स 2006 का समापन समारोह हुआ था और उसमें 2010 के लिए भारत को मेजबानी सौंपी गई। आयोजन समिति ने जो पैसे यहां खर्चे थे उस पर अय्यर ने सवाल उठाए थे। 12 मिनट के शो पर 29 करोड़ खर्च किए और मेहमानों को मेलबर्न लाने पर 11 करोड़ खर्च हुए। इन 12 मिनटों में ऐश और सैफ अली खान ने डांस शो किया था, जिसके बाद शीला दीक्षित ने झंडा संभाला था और इस शो में शिरकत करने पहुंचे तमाम मंत्री, नेता और अधिकारियों के फ्लाइट पर 11 करोड़ खर्च किए गए, यानी कुल खर्च 40 करोड़ का।

अय्यर यह जानना चाहते थे कि जिस देश में पंचायती राज के लिए 50 करोड़ रुपये का बजट है वहां महज़ 12 मिनटों में 40 करोड़ कैसे उड़ाए जा सकते हैं। 1982 के एशियाड 55 करोड़ में संपन्न हुए, लेकिन इन सवालों का जवाब देने की बजाय कलमाड़ी ने कहा कि 'मैं यहां का इनचार्ज हूं'। साफ था कलमाड़ी एपेक्स कमेटी को मानने को तैयार नहीं थे। खेल मंत्री को भी मानने को तैयार नहीं थे। अय्यर ने यह भी सवाल उठाए थे कि एनडीए सरकार ने खेलों के लिए 650 करोड़ का बजट रखा था यह बढ़कर 6600 करोड़ हो गया, यह बहुत ज़्यादा है। 2003 एफ्रो एशियन गेम्स महज़ 100 करोड़ में हुए। 2006 मेलबर्न कॉमनवेल्थ गेम्स पर 2290 करोड़ खर्च हुआ फिर हिंदुस्तान में इतना खर्च क्यों?
मणिशंकर अय्यर के इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं था। न कलमाड़ी के पास और न उस वक़्त के जीओएम के अध्यक्ष और गृह मंत्री अर्जुन सिंह के पास. और ना ही केंद्र सरकार के पास। लेकिन कहीं न कहीं अय्यर सरकार की नज़रों में खटकने लगे थे और 2 साल तक खेलमंत्री बने रहने के बाद उनसे कुर्सी छीन ली गई।

जनवरी 2008 में अय्यर हांगकांग में थे। एक ई-मेल के ज़रिए उन्हें सूचना दी गई और उन्हें खेल मंत्री के पद से हटा दिया गया, जबकि अय्यर दो दिन बाद ही स्पोर्ट पॉलिसी पेश करने वाले थे। क्या वजह थी अय्यर को किनारे करने की। आज जब सारा घोटाला सामने आ रहा है, तो इसे समझा जा सकता है। अय्यर के जाने के बाद एपेक्स कमेटी का क्या हुआ कुछ नहीं पता। पर्दे के पीछे वह कमेटी ही ख़त्म कर दी गई, जो कलमाड़ी की आयोजन समिति से सवाल कर सकती थी। इसके पीछे कौन हो सकता है। नए खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल कलमाड़ी को पूरी तरह से शह देते दिख रहे हैं। ज़ाहिर है मौजूदा तस्वीर अपने आप काफी कुछ कह रही है। करप्शन वेल्थ गेम्स में आप सुरेश कलमाड़ी से मिल चुके हैं। अब ज़रा इस फेमली की एक और मेंबर दिल्ली सरकार यानी शीला दीक्षित से मुलाक़ात हो जाए। दिल्ली सरकार के पास खेल का सबसे बड़ा बजट है। 16560 करोड़ रुपये का, जिसमें से ज़्यादातर काम पीडब्ल्यूडी के पास है। पीडब्ल्यूडी में धांधली का हम आपको सिर्फ एक उदाहरण देंगे...
इंदिरा गांधी स्टेडियम की मरम्मत के लिए बजट रखा गया था 271 करोड़ रुपये। हालांकि यह रकम भी एक स्टेडियम की मरम्मत के लिए कहीं ज़्यादा, लेकिन शीला सरकार ने इसके मुकाबले भी 2.5 गुणा ज़्यादा 669 करोड़ रुपया इस स्टेडियम पर खर्च किया है।

अंदाज़ा लगा सकते हैं कि बाकी प्रोजेक्ट्स में क्या धांधली हुई होगी। करप्शन वेल्थ गेम्स फेमिली की यह मेंबर झूठे वादे करने में भी माहिर हैं। इन्होंने कहा था कि 10 अगस्त तक दिल्ली में कहीं मलबा नहीं दिखेगा, लेकिन जब यह झूठ साबित हो गया तो नई तारीख तय कर दी गई। 31 अगस्त, 2010। लेकिन मीडिया का प्रेशर था लिहाज़ा 11 अगस्त को मुख्यमंत्री साहिबा की सवारी निकल पड़ी दिल्ली की सड़कों पर जायज़ा लेने कि कहीं मलबा है कि नहीं। लेकिन देखिए शीला जी का मुआयना कैसे चल रहा है। गाड़ी में बैठे-बैठे वह पूरी दिल्ली घूम लीं, लेकिन उससे उतरने की ज़हमत नहीं उठाई। वजह क्या हो सकती है। पहली वजह हो सकती है कहीं बाहर निकलने पर मलबे के बीच में फंस न जाएं। दूसरी वजह हो सकती है कि कहीं मलबे के साथ शीला जी की तस्वीर न खींच ली जाए ख़ैर शीलाजी निकली थीं राजधानी में 19 सड़कों पर मुआयना करने, लेकिन कुछ सड़कों तक ही गाड़ी में घूमने के बाद थक गईं। वैसे, शीलाजी पर बारिश ज़रूर मेहरबान है, जो मलबा हटाना है उसके आड़े आ रही है यह बारिश, जो सीएम साहिबा के माथे पर दरारों को बढ़ा देती है।
अब बारी है शहरी विकास मंत्रालय की जिसे सम्भालते हैं जयपाल रेड्डी साहब। इनके पास भी भारी भरकम बजट है और इस बजट में लूट किस तरह से मची है। गौर करिए... रेड्डी साहब के नीचे काम करने वाला विभाग सीपीडब्ल्यूडी और बस इस विभाग की धांधली की बानगी भर देख लिजिए....

जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के लिए बजट था 455 करोड़ का और इतने में बस स्टेडियम की मरम्मत होनी थी, लेकिन खर्च कितना हुआ 961 करोड़ रुपये। इसी पर कीर्ति आजाद ने लोकसभा में सवाल उठाया था कि नागपुर में एक स्टेडियम 90 करोड़ में बनकर खड़ा हो जाता है, तो यहां एक स्टेडियम की मरम्मत पर ही 961 करोड़ कैसे खर्च हो सकते हैं।

दूसरा नेशनल स्टेडियम, इसका बजट था 113 करोड़ रुपया, लेकिन रेड्डी साहब के विभाग ने खर्चे 262 करोड़ रुपये। दोगुने से भी ज़्यादा। तूसरा कर्णी सिंह शूटिंग रेंज बजट था 16 करोड़ का और खर्च हुआ 140 करोड़ यानी करीब करीब 9 गुना ज़्यादा खर्च। रेड्डी साहब ये आंकड़े तो पचते नहीं हैं। शायद यही वजह है कि रेड्डी साहब भी लोकसभा में कलमाड़ी को बचाने के लिए आंकड़ों की तस्वीर पेश करते हैं।

कॉमनवेल्थ गेम्स देखते हुए एमसीडी को दिल्ली को आवारा पशुओं से निजात दिलाना था। मगर पिछले चार सालों में एमसीडी के 9 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद आवारा जानवर आज भी दिल्ली की सड़कों पर शहंशाह की तरह बैठे हैं। इसके लिए एमसीडी ने 15 पेट्रोलिंग टीमों का गठन किया है। ये टीम 11 सितम्बर से आवारा पशुओं को पकड़ने के लिए तैनात सड़कों पर निकल पड़ेंगी। आवारा पशुओं को पकड़ने के लिए 13 हाइड्रोलिक कैटल कैचिंग ट्रक भी खरीदे गये हैं, लेकिन यहां सवाल यह है कि एमसीडी को जो कामयाबी पिछले चार सालों में नहीं मिली क्या वह कामनवेल्थ से पहले एक महीने में मिल जाएगी। वैसे एमसीडी से ज़्यादा उम्मीद तो नहीं है, लेकिन सफलता मिलती है तो कामनवेल्थ के बहाने ही सही सड़कों पर बैठे आवारा जानवरों से छुटकारा तो मिल ही जाएगा।

 

 

 

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