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डाकू पान सिंह तोमर

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Mon Aug 16 2010 22:13:58 GMT+0530 (India Standard Time)

अब तक आपने चंबल के डकैतों की कहानी सुनी होगी, लेकिन आज हम आपको बता रहे हैं चंबल के रॉबिनहुड की कहानी। उसने पहले सरहद पर सेना की वर्दी पहन कर देश के दुश्मनों से बदला लिया, फिर रेसिंग ट्रैक पर दौड़ लगाकर अच्छे अच्छों के छक्के छुड़ाए। अपनों की नफ़रत और क़ानून की चौखट पर मिली ज़िल्लत ने उसे डकैत बनने पर मजबूर कर दिया। पान सिंह तोमर। यही वह नाम था, जिसने चंबल के बीहड़ों की आवो हवा के बीच अपना बचपन गुज़ारा, लेकिन ज़िंदगी में कुछ कर गुज़रने के जज़्बे के साथ आख़िर वह कैसे कामयाबी की सीढी चढता गया। बीहड़ों के बीच एक बचपन। अम्मा और बाबूजी के साये से महरूम पान सिंह बड़ा हो रहा था। भले ही मौज़ूदा हालात में लेपा भिडोसा गांव के सरकारी स्कूल की सूरत बदल गई है। इसे पक्का कर दिया गया है, लेकिन वह वक़्त भी था जब पान सिंह ने खुले आसमान के नीचे यहीं शुरूआती तालीम हासिल की। लेकिन हालात के हाथों मजबूर गांव का पाना अपने आप को बीहड़ों से दूर नहीं रख पा रहा था। जेठ की दुपहरी हो या फिर सावन की फुहार। हर मौसम की मार पान सिंह ने अपनी ज़िंदगी के 18 साल तक झेले। लेकिन हर थपेड़ो को झेलता हुआ अम्मा बाबू जी का पाना उनकी यादों को दिल में संजोए अपने सपने को साकार करने के लिए कामयाब कोशिश में लगा रहा और एक दिन अपने तमाम अरमानों के साथ गांव से बाहर निकल गया। बीहड़ों की आवोहवा से बहुत दूर।

कामयाबी पान सिंह के क़दम चूम रही थी। बचपन से बीहड़ों में नंगे पांव चलने वाले पान सिंह ने अपने हुनर का इस्तेमाल करना शुरू कर किया और आजादी के एक साल बाद यानी कि 1948 में उसे देश की सेवा का मौक़ा मिला। पान सिंह ने सेना में नौकरी शुरू कर दी। बीहडों का पाना सरहद पर सुबेदार पान सिंह तोमर के नाम से जाना जाने लगा। दुश्मनों से हर वक़्त दो दो हाथ करने को बेताब पान सिंह तोमर का जज्बा ही था कि उसे जल्द ही तरक्की दे दी गई। वह साल था- 1958. पान सिंह तोमर को रूड़की के आर्मी कैंप में तैनात कर दिया गया। वहां न सिर्फ़ सच्ची लगन के साथ वह देश की सेवा में लगा रहा, बल्कि अपने हुनर को निखारने का भी उसे पूरा मौक़ा मिला। पान सिंह को एथलीट के रूप में भी जाना जाता था। देश की सेवा करते हुए पान सिंह ने बतौर एथलीट न सिर्फ़ देश में, बल्कि विदेशों में भी कामयाबी का परचम लहराया। लंबी कूद और दौड़ में तो पान सिंह ने ऐसी छलांग लगाई कि अच्छे अच्छों को भी पसीना आ गया।

पान सिंह तोमर ने देश के लिए कई स्वर्ण पदक हासिल किए और शायद यही वजह है कि देश के गौरव कहे जाने वाले मिल्खा सिंह तक पान सिंह तोमर के कामयाब ज़िंदगी को आज भी सलाम करते हैं। कभी सरहद पर तो कभी सात समंदर पार अपने बुलंद हौसलों के साथ कामयाबी की सीढी चढते पान सिंह तोमर की ज़िंदगी अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी। ज़िंदगी में सबकुछ हासिल करने के बावजूद, वह अपनी माटी को नहीं भूला था। बेशक फ़र्ज़ की ख़ातिर वह सरहद पर दुश्मनों से लोहा लेता रहा, लेकिन सच तो यह भी है कि बीहड़ों से निकलने से पहले अपनों से किया एक एक वादा भी उसे याद था।

सरहद से लेकर बीहड़ तक के उसके सफर में कई उतार-चढाव आए, लेकिन हर हालात का मुक़ाबला उसने हिम्मत से किया। बेशक उसकी मौत अब से तीन दशक पहले हो चुकी है, लेकिन उसकी कहानी आज भी बीहड़ में बच्चे बच्चे की जुबान पर है। चंबल की बीहड़ों के बीच बसा एक गांव, मध्यप्रदेश के मुरैना शहर से क़रीब 45 किलोमीटर दूर बसा गांव लेपा भिडोसा आज वीरान पड़ा है। हर किसी की आंखों में बीते दिनों की दास्तां को साफ़ पढ़ा जा सकता है। सच तो यह है कि दहशत के उन दिनों को याद करने की ज़रूरत नहीं। वह तो उनकी ज़िंदगी का हिस्सा है। 80 की हो चली बुधिया तो हर वक़्त घऱ की चौखट की ओर टकटकी लगाए बैठी है। उसकी पलक नहीं झपकती, क्योंकि कुछ दशक पहले बीहड़ों के ख़ौफ़ ने उसकी आंखों की नींद चुरा ली है। उसने अपनी आंखों से देखा है मौत के हर ख़ौफ़नाक मंज़र को। बुधिया का पति वीरपाल गुमनामी की ज़िंदगी जी रहा है। ज़िंदगी के आख़िरी लम्हों में अपनों साथ छूट जाने की कसक महसूस कर रहा है वीरपाल। दरवाज़े पर होने वाले हर दस्तक उसके लिए किसी दहशत से कम नहीं। बुधिया और वीरपाल की तरह ही कमोवेश यहां के हर वाशिंदों का हाल है। किसी का बचपन ख़ौफ़ के बीच गुज़रा था, तो कोई बच्चा अपने बाप दादा दहशत की उस कहानी को किस्सों में सुनता है,तो कुछ ऐसे भी हैं जो अपनों से पूछते हैं अपने पिता का नाम। अपने चाचा के मौत की कहानी हर जवाब उन्हीं दहशत पर जाकर ख़त्म होती है, जिसका दंश यहां के लोगों के कई दशत तक झेला। कोई बेटा अनाथ हुआ, तो कोई सुहागन विधवा हो गई। कहानियों की शक्ल में इस गांव की तस्वीर अब सबके सामने हैं, एक ऐसी कहानी जिसकी हर इबारत ख़ून से लिखी गई। नफ़रत की बुनियाद पर ख़ून से लिखी गई हर इबारत लोगों के दिलो दिमाग को आज भी झकझोर रहा है।

वह आज़ादी के पहले का वक़्त था। देश की आवाम गुलामी का दंश झेल रही थी। अंग्रेज़ी हुकूमत से आज़ादी पाने की जंग जारी थी, लेकिन तब भी बीहड़ों की अपनी अलग हुकूमत थी और बीहड़ो के आस- पास के गांव के वाशिंदे अंग्रेज़ों के हुक्म के ग़ुलाम नहीं थे, बल्कि उन्हें परवाह थी डकैतों के आदेश की। बीहड़ों के आस पास कोसों दूर तक अगर किसी के हुक्म की तामील की जाती थी, तो वह थे वे डकैत जिनके आतंक का डंका बजता था। यानी कि हर हाल में ग़ुलामी। लेकिन ग़ुलामी के उस दौर में लेपा भिडोसा गांव में एक बच्चा ऐसा भी था, जो मिट्टी के बने इस आशियाने में अपने दो और भाईयों और अपनी इकलौती बहन के साथ रहते हुए ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करने का सपना देख रहा था। अम्मा और बाबू जी ने इस बच्चे का नाम पान सिंह रखा। जब वो महज़ चार साल का था, तो बाबू जी का साथ छूट गया। अम्मा के आंचल से लग कर दुनिया की तमाम दुश्वारियों से अपने आप को महफ़ूज रखने की कोशिश कर रहे पान सिंह की किस्मत में यह ख़ुशी भी मयश्सर नहीं थी। बाबू जी मौत के कुछ दिनों बाद ही अम्मा भी चल बसी। हर गुज़रते वक़्त में उसे अकेलेपन का एहसास तो था, लेकिन ज़िंदगी में एक मुकाम हासिल करना उसकी मंजिल थी।

चंबल की आवोहवा में बचपन गुजारने वाले पान सिंह ने सिर्फ सरहद पर ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी देश का नाम रौशन किया। कामयाबी उसके क़दम चूम रही थी, लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब उसकी ज़िंदगी ठहर सी गई और वह बन गया डाकू। क्या थी वह वजह बताएंगे एक छोटे से ब्रेक के बाद। बीहड़ों में गुजरा बचपन, सरहद पर जवानी और बदलते वक़्त के साथ सात समंदर पार कामयाबी का परचम। यह थी पान सिंह की ज़िंदगी। कभी फ़र्ज़ की ख़ातिर सरहद पर तो कभी अपनों से किए वादे को निभाने बीहड़ों के बीच बसे अपने गांव लेपा भिडोसा में। वह गांव आता था, अपनों के बीच ख़ुशियां बांटने और जब कभी सरदह उसे बुलाती थी। वह फ़र्ज़ की ख़ातिर निकल जाता।

गांव की आवो-हवा से दूर पान सिंह तोमर सरहद पर अपना फ़र्ज़ निभाते-निभाते अब 55 का हो चला था। अपने वतन की ख़ातिर उसने पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी। लेकिन सैकड़ों कोस दूर गांव में उसके अपने मुश्किल में थे। पान सिंह वापस लौटा। घर की वीरान चौखट उन मुश्किलों के मंज़र को समझने के लिए काफ़ी था और एक दिन ऐसा भी आया जब मानो वक़्त का पहिया थम गया। हालात के आगे कभी हार नहीं मानने वाला पान सिंह हालात से समझौता करने को तैयार हो गया, लेकिन उसके अपने समझौते के लिए उसकी हर कोशिश पर ना की मुहर लगा रहे थे। हालात बद से बदतर होता गया और एक दिन ऐसा भी आया जब पान सिंह अपने पर काबू नहीं रख सका और यही वक़्त था जब पान सिंह की ज़िंदगी ने करवट ली। उसने अपने हाथों में बंदूक उठा ली और मेजर पान सिंह तोमर से बन गया डाकू पाना।

पान सिंह डकैत बन चुका था। वह पान सिंह, जो अपने वतन से अपनी वर्दी से बेइंतहा मोहब्बत करता था। आख़िर वह कौन सी वजह थी कि उसने वतन और वर्दी दोनों से तौबा कर ली। आख़िर क्यों मेजर पान सिंह तोमर बन गया डाकू पाना। रेसिंग ट्रैक पर दौड़ लगाकर हर एक को शिकस्त देने वाला पान सिंह आख़िर क्यों बना डाकू। आईए इन्हीं सवालों के साथ हम आपको लेकर चलते है एक बार फिर पान सिंह के उसी गांव में। बदन पर वर्दी की जगह आम लिवास और हाथों में बंदूक, ठिकाना चंबल का बीहड़। यह पहचान थी उसी पान सिंह तोमर की, जिसे हालात ने डाकू बनने पर मजबूर कर दिया। गांव में वह अपनों से मिन्नतें करता रहा। ख़ुदा का वास्ता देकर उन्हें नफ़रत छोड़ देने को कहा, वह लोगों से कहता रहा कि दुश्मनी अपनों से नहीं की जाती। लेकिन किसी ने भी उसकी एक न सुनी और फिर वही हुआ जिसका डर था। ज़मीन के लिए जंग और जमाने के सामने जिल्लत पान सिंह तोमर को बर्दाश्त नहीं हुई। बावजूद इसके, बगावत का रास्ता भी उसे मंजूर नहीं था। वह अपनों से नफ़रत की दीवार गिरा देने को कहता रहा, लेकिन उसकी हर बातों को अनसुना कर दिया गया। धीरे-धीरे पान सिंह के सब्र का बांध टूट रहा था और एक दिन तो उसके अपनों ने सारी हदें ही पार कर दी।

उसके खेत को आग के हवाले कर दिया गया। उसने अपनी आंखों से देखा था वह मंज़र। आग की हर लपटें उसके जेहन में अपनों के लिए नफ़रत भर रही थी। पल भर में सब कुछ जलकर खाक हो गया। लेकिन अब भी पान सिंह को उस क़ानून पर भरोसा था। उस वर्दी पर ऐतबार था, जिसके साथ उसने अपनी तमाम उम्र गुज़ार दी। वह अपनी फ़रियाद लेकर क़ानून की चौखट पर गया। लेपा भिडोसा से क़रीब 15 किलोमीटर दूर सिहोनियां थाने जाकर उसने क़ानून के रखवालों से फ़रियाद की। क़ानून के उन रखवालों को वर्दी की सौगंध दी, लेकिन वहां भी उसे जलालत ही झेलनी पड़ी। पान सिंह तोमर डाकू पाना बन गया। हाथों में बंदूक लेकर अपने भाईयों के साथ निकल पड़ा बीहड़ो में उसकी रातों की नींद और दिन का चैन कहीं खो गया। उसकी आंखों में थी उस तबाही की एक-एक तस्वीर। जेहन में अपनों और क़ानून के रखवालों के लिए नफ़रत। उसने अपने दुश्मनों से गिन-गिन कर बदला लेना शुरू कर दिया। बीहड़ों में रहते हुए अब उसकी ज़िंदगी का सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही मक़सद था और वह था अपने दुश्मनों का ख़ात्मा।

क़ानूनी काग़ज़ातों में उसके हर वारदात कलमबंद किए जाने लगे और देखते ही देखते धौलपुर से लेकर भिंड तक के क़रीब 100 किलोमीटर के दायरे में डाकू पाना ख़ौफ़ का दूसरा नाम बन गया। उसके साथ गिरोह में काम कर चुके डकैतों को आज भी डाकू पाना के बदले की कहानी याद है। सरहद पर अपने फ़र्ज़ की ख़ातिर दुश्मनों से बदला लेने वाला पान सिंह तोमर गिन-गिन कर उनलोगों से बदला लिया, जिनकी वजह से देश का एक सच्चा सिपाही क़ानून का गुनहगार बना था। पुलिस पान सिंह उर्फ पाना को अपनी गिरफ्त में लेना चाहती थी और पान सिंह कानून के उन रखवालों को देना चाहता था हर हाल में मौत। हालत के हाथों मजबूर, बदले की आग में जल रहा पान सिंह कभी शिकस्त का स्वाद न चखने वाला डाकू पाना आख़िरकार पुलिस की एक साज़िश का शिकार हो गया। क्या थी वह साज़िश वह अपनों की गद्दारी थी या फिर थी पुलिस की चाल।

सरहद का एक सच्चा सिपाही क़ानून का गुनहगार बन चुका था। उसे याद था अपना जलता खेत, आग की एक-एक लपटें नफ़रत बन कर उसके जेहन में समा चुकी थी और वही नफ़रत बंदूक की गोलियों की शक्ल में उसके दुश्मनों का सीना छलनी कर रही थी। उसे गिला था अपनों से और शिकवा समाज से। क़ानून के रखवालों ने उसे बागी बनने पर मजबूर किया था। बदले की आग में जल रहा डाकू पाना मौक़े की तलाश में था और एक दिन अपने गिरोह के साथ सिहोनियां थाने में भी मौत कर टूट पड़ा। कई बार डाकू पाना के साथ पुलिस की मुठभेड़ हुई, उसके साथी मारे गए। पाना को अपनों के खोने का गम तो होता था, लेकिन ज़िंदगी में इतने जख़्म झेलने के बाद शायद उसके आंखों के आंसू सूख गए थे। क़ानून की हर चाल से वाकिफ़ पाना हर बार पुलिस को चकमा देकर अपनी मंजिल की ओर बढ रहा था और यही वजह है कि क़ानून से सताया हर एक डाकू उसे अपना सरदार मानने लगा। लेकिन हर क़दम पर कामयाबी हासिल करने वाला डाकू पान सिंह आख़िर हार गया। नवंबर 1981, भिंड के गोहद थाने के इलाक़े में पुलिस ने उसे मौत दे दी। भले ही भिंड के तत्कालीन पुलिस कप्तान रमन ने डाकू पाना की मौत को मुठभेड़ क़रार दिया, लेकिन चंबल के रॉबिनहुड की मौत के पीछे छिपा था एक ऐसा सच, जो सामने आया पी-7 न्यूज की तहक़ीक़ात में।

गांव का पाना, सरहद का सुबेदार पान सिंह तोमर विदेशों में एथलीट पान सिंह के नाम से जाना जाने वाला हमेशा हमेशा के लिए ख़ामोश कर दिया गया, लेकिन सच तो यह कि आज भी बीहड़ो की आवो हवा में उसके कामयाब सफ़र की यादें ताज़ा है और शायद यही वजह है कि 30 साल बाद जल्द ही रूपहले पर्दे पर भी उसकी कहानी दोहराई जाने वाली है। यह उसका कामयाब सफ़र ही था कि आज भी लोग पान सिंह तोमर का नाम अदब से लेते हैं। क़ानून की किताब में बेशक उसे डाकू पाना का नाम दिया गया, लेकिन बीह़ड़ों में आज भी उसे लोग रॉबिनहुड के नाम से ही याद करते हैं।

 

 

 

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