Sun Aug 22 2010 21:33:07 GMT+0530 (India Standard Time)
दो दिलों की मुहब्बत पर दुनिया जमाने से उठाती रही है उंगली। कभी बिरादरी, तो कभी ऊंच नीच के नाम पर। कभी अमीर ग़रीब, तो कभी गोत्र या रसूख के नाम पर। दुनिया प्यार पर बिठाती रही है पहरे। लेकिन सोच कर देखिए कि महज़ झूठी शान की ख़ातिर किसी को मौत की सज़ा बांटने वाले उन बेशर्म रिश्तेदारों के आगे क्यों ख़ामोश हो जाता है क़ानून। क्यों इक्कीसवीं सदी की तमाम तरक्कियों तमाम उजालों के बीच। आज भी ज़िन्दा है ऑनर किलिंग नाम का राक्षस। हमारी आप सबसे इल्तज़ा है कि प्लीज डॉन्ट हेट लव स्टोरीज़...
मोहब्बत करने वाले दो दिलों को जुदा करने के लिए गुनहगार कौन है? आप, हम या फिर हमारा समाज। आख़िर क्यों अपने ही दे रहे हैं अपनों को मौत। आख़िर क्यों रिश्तों की नहीं रह गई है कोई अहमियत। कहीं इज़्ज़त की खातिर तो कहीं रसूख और दिखावे की ख़ातिर। लोग अपनों पर चलाते हैं गोलियां। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि आख़िर क्यों लोग ले रहे हैं अपनों की जान?
अपनों का क़त्लः रिश्तों का ख़ून, अपनों का क़त्ल। यह हक़ीक़त है उस समाज की जहां रहते हैं हम और आप। लेकिन हमारे बीच ऐसे भी लोग हैं, जो बिना सोचे समझे अपनों का ख़ून बहाने से भी नहीं हिचकते। कभी रसूख तो कभी समाज के लोक लाज के डर से तो कभी उसी समाज के चंद ठेकेदारों के फ़ैसले की वजह से अपने ही बन जाते हैं अपनों के दुश्मन। कभी खाप बनता है प्यार करने वाले दो दिलों के लिए शाप, तो कभी एक बाप तो कभी एक भाई बन जाता है क़ातिल। अपनी बेटी का, अपनी बहन का। वह चीखती है अपनों के सामने पूछती है सवाल अपने पापा से, अपने भईय़ा से कि एक बार तो बता दो आख़िर मेरा कसूर क्या है?
लेकिन बदले में उसे मिलती है मौत। उन्हीं के हाथों जिनके गोद में खेलकर वह बडी हुई थी। उसका कसूर सिर्फ़ इतना ही था न कि उसने घरवालों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किसी से प्यार किया था। लेकिन ज़रा सोचिए कि क्या इतनी सी ख़ता की इतनी बड़ी सज़ा। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ बेटी या बहन को ही अपनों के हाथों दी जा रही है मौत, बल्कि कहीं तो बेटे और भाई को उतार दिया जाता है मौत के घाट। कभी दौलत दो दिलों के बीच दूरियां पैदा करता है, तो कभी दो दिलों की मोहब्बत को जमाने से मिलती है लानत। नतीजा होता है बेहद ही ख़ौफ़नाक या यूं कहें कि बेहद हीं शर्मनाक। क्योंकि यहां क़ातिल के कठघरे में कोई और नहीं, बल्कि होता है कोई अपना जी हां कोई अपना। भले ही बाद में उसे अपने किए पर पछताबा हो, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि जब तक वह कुछ समझ पाता है तब तक शायद काफी देर हो चुकी होती है।
पी-7 न्यूज़ का सवालः आज पी-7 न्यूज कर रहा है आप तमाम लोगों से सवाल। क्या कभी आपकी अंतरात्मा आपको नहीं धिक्कारती, क्या उस वक़्त आपके हाथ नहीं कांपते जब आप दे रहे होते हैं अपनों को मौत। क्या वाकई मर गई है हम सब की अंतरात्मा। अगर नहीं, तो क्यों बनते हैं आप अपनों के दुश्मन। क्यों लेते हैं आप अपनों की जान? आप यह क्यों नहीं सोचते कि यह तमाचा है आप पर। हम पर, हम सब पर। हमारी आपसे गुज़ारिश कि अब भी वक़्त है, जरा सोचें कि ख़ून वो भी रिश्तों का, अपनों का, आखिर क्यों?
एक बार फिर दो मासूम मुहब्बतों को कुचल डाला गया। झूठी शान के नाम पर फिर मुहब्बत का सीना छलनी कर डाला गय़ा। इस बार इस घिनौनी वारदात का गवाह बना है पंजाब का मोगा शहर, जहां एक बाप ने न सिर्फ़ बड़े नाजों से पाली अपनी बेटी, बल्कि उसके प्रेमी को भी दे दी सजा ए मौत।
टूट गई आसः एक आस थी जो टूट गई। उस आस के टूटन ने जो उदासी फैलाई। उसकी कालिख मोगा के चांदपुरान इलाक़े की इन गलियों में साफ़ देखा जा सकता है। ख़ामोशी बयां करती है कि एक बार फिर अपनों की उन करतूतों को जिसकी इबारत ख़ून से लिखी गई है। दरअसल, गांव के इस घर में हुआ है वह गुनाह। जो पूरे देश में ऑनर किलिंग के नाम से बदनाम है। उन्नीस साल की लवप्रीत कौर और उसके प्रेमी हरजिन्दर का सीना गोलियों से छलनी कर दिया गया। एक बेटी को मौत देते वक़्त एक पिता के हाथ नहीं कांपे। ठीक सुना आपने, क़त्ल का इल्ज़ाम लगा है लवप्रीत का पिता इकबाल सिंह पर। कहा जाता है कि लवप्रीत और हरजिन्दर दोनों एक दूसरे से बेइंतहां मोहब्बत करते थे, लेकिन लवप्रीत के घरवालों ने दोनों के प्यार को अपनी मंज़ूरी नहीं दी थी।
कहते हैं न प्यार किसी बंदिश का मोहताज़ नहीं होता है और यही हुआ इस मामले में भी। हरजिंदर हालात से बाखबर होने के बावजूद, अपने आप को रोक नहीं पाया और अपनी प्रेमिका से मिलने जा पहुंचा उसकी चौखट पर। अपनी बेटी के प्रेमी को अपनी दहलीज़ पर देखकर एक बाप अपने पर काबू नहीं रख सका और झूठी शान की खातिर न सिर्फ़ हरजिंदर को, बल्कि अपनी बेटी को भी दे दी मौत। लेकिन एक पिता की सनक यहीं ख़त्म नहीं हुई। अपने भाई को ढूंढता हरजिंदर का भाई कुलजिंदर जब इकबाल सिंह के घर पहुंचा, तो नफऱत की गोलियां उसके सीने को भी छलनी कर गई।
ज़ाहिर है कि एक बार फिर झूठी इज़्जत के नाम पर दो मासूमों को मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन हत्यारे को न तो अपने किए का अफ़सोस है और न हत्याओं का कोई मलाल। अब उस हत्यारे को गिरफ़्तार करने की ज़िम्मेदारी तो पुलिस की है, लेकिन झूठी इज़्ज़त के नाम पर अपनों की ही हत्या करने वाली ज़िद्द को दूर करने कि ज़िम्मेदारी तो सिर्फ़ और सिर्फ हमारी आपकी हमारे समाज की है।