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करार पर क्यों है तकरार ?

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Wed Aug 25 2010 12:33:02 GMT+0530 (India Standard Time)

संसद के मानसून सत्र में चंद रोज ही बचे हैं और सरकार न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल को जल्द से जल्द पास करवाने को बेकरार है। विपक्ष के सुझाव पर बिल में 18 संशोधनों को मंजूरी दी गई है। लेकिन अब भी इस बिल में कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार और विपक्ष में सहमती नहीं बन पाई है।
सबसे बड़ा मसला है सप्लायर की जिम्मेदारी का
हादसे की स्थिति में सप्लायर पर किसी तरह की जिम्मेदारी इस बिल में तय नहीं की गई है। अगर किसी तरह का हादसा होता है तो उसके लिए मुआवजा प्लांट लगानेवाली कंपनी जैसे GE नहीं चुकाएगी। हादसे की स्थिति में 1500 करोड़ तक का मुआवजा चुकाएगी NTPC, और अगर उसके बाद भी मुआवजे की कोई रकम बनती है तो वो रकम भारत सरकार चुकाएगी। इसलिए विपक्ष का इल्जाम है कि देश की संसद में पेश होनेवाला ये बिल है मेड इन यूएसए।
संसद में पेश किये जाने से दो दिन पहले परमाणु दायित्व विधेयक की राह में नयी मुश्किलें पैदा हो गयी हैं। इस मसले पर प्रधानमंत्री ने आज कैबिनेट की बैठक भी बुलाई। इस बैठक में यह तय हुआ कि सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री पृथ्वीराज चौहान विपक्ष को भरोसे में लेने की पहल करेंगे। सरकार का इरादा बुधवार या गुरुवार को इस बिल को संसद में पेश करने का है। वहीं बीजेपी और वाम दलों ने विधेयक के मसौदे में नये बदलावों के जरिये आपूर्तिकर्ता के दायित्व को कमजोर करने के लिये सरकार को आड़े हाथों लिया है। भाजपा और वाम दलों ने विधेयक के मसौदे में किये गये एक संशोधन पर आशंका जताते हुए कहा है कि इसके जरिये गंभीर लापरवाही या खराब आपूर्ति करने की स्थिति में विदेशी कंपनियों को बचाने की कोशिश की जा रही है।
देश में 4500 मेगावाट परमाणु बिजली का उत्पादन होता है, जबकि लक्ष्य है इसे बढ़ाकर 20 हजार मेगावाट तक लेजाने का। 2032 तक देश में 60 हजार मेगावाट परमाणु बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन पाकिस्तान के अलावा भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहां परमाणु हादसा होने पर मुआवजे के लिए कोई कानून अब तक नहीं है। अब सरकार ने जिस तरह न्यूक्लियर लायबिलिटी एक्ट में 18 संशोधन किए हैं। उसके बाद प्लांट को मशीनर सप्लाई करनेवाली कंपनियों के लिए शर्तें पहले से भी कहीं ज्यादा आसान हो गई हैं।
क्लॉज 17 B में साफ तौर पर लिखा है कि जानबूझकर या इरादतन हुए हादसे मे ही सप्लायर की जिम्मेदारी बनेगी। इसी तरह क्लॉज 7(1) के तहत निजी कंपनियों को ऑपरेटर बनने की इजाजत दे दी गई है और अगर प्राइवेट सेक्टर की ओर सेबने न्यूक्लियर पावर प्लांट में हादसा होता है तो क्लॉज 7-1 के मुताबिक इस हादसे की पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी। यानी मुआवजे की सारी रकम सरकार चुकाएगी।
परमाणु ऊर्जा उत्पादन (% में)
अब हम आपको ग्राफिक्स के जरिए दिखाते हैं कि एटमी ऊर्जा का उत्पादन कहां और कितना होता है। आप देख सकते हैं फिलहाल भारत अपनी जरूरत का महज 3 फीसदी ही एटमी ऊर्जा से हासिल करता है। ऐसा ही चीन में भी है। जबकि फ्रांस में न्यूक्लियर एनर्जी स 78 फीसदी बिजली तैयार होती है।
भारत 3
चीन 3
फ्रांस 78
यूक्रेन 47.5
जर्मनी 32
जापान 30
कोरिया 39
ब्रिटेन 18
अमेरिका 19
2050 भारत 25 %
न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अब कई दौर की बातचीत के बाद उसमें क्या परिवर्तन आया है। यानी जिस बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दी है। उसमें है क्या ? ऑपरेटर की जिम्मेदारी
पहले 500 करोड़
अब 1500 करोड़
सप्लायर की जिम्मेदारी
पहले लापरवाही या जानबूझकर की गई गलतियों पर
अब घटिया मशीन की आपूर्ति करने पर भी
सरकार की जवाबदेही
पहले 2100 करोड़ रुपये
अब बढ़ाई जा सकती है रकम
न्यूक्लियर लायबिलिटी फंड
पहले कोई व्यवस्था नहीं
अब अमेरिका की तर्ज पर बनेगा फंड
नुकसान का दायरा
पहले जिंदगी या संपत्ति का नुकसान
अब फसल, पेड़-पौधे,जानवरों को हुआ नुकसान
मुआवजे की समयसीमा
पहले हादसे के 10 साल के अंदर
अब 20 साल तक
भारत में न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल में सप्लायर और ऑपरेटर की जवाबदेही मसले पर भारी हंगामा मचा है। अब हम आपको बताते हैं दुनिया के बाकी के देशों में इसके लिए किसी तरह की व्यवस्था है।
सप्लायर की जिम्मेदारी
चीन - ऑपरेटर की पूरी जिम्मेदारी। खास अदालत में चलेगा मामला।
जापान 1961 एक्ट के तहत पूरी जवाबदेही प्लांट ऑपरेटर की।
कोरिया - ऑपरेटर की पूरी जिम्मेदारी।
साउथ अफ्रीका 1999 एक्ट के तहत हादसे में पूरी जिम्मेदारी प्लांट ऑपरेटर की। सप्लायर की कोई जिम्मेदारी नहीं।
रुस वियेना कन्वेंशन के मुताबिक सारी जवावदेही सिर्फ ऑपरेटर की।
जर्मनी हादसे की स्थिति में पूरी जवाबदेही ऑपरेटर की। इसके लिए 2.5 बिलियन ड्यूश की जमानत सरकार के पास जमा करानी होती है।
अमेरिका 1957 का प्राइस एंडरसन एक्ट लागू। ऑपरेटर की जिम्मेदारी 250 करोड़ तक सीमित। लेकिन सप्लायर भी कानूनी तौर पर जवाबदेह है। हादसे की स्थिति में मुआवजा देना ऑपरेटर की जिम्मेदारी है। लेकिन लापरवाही या पार्ट पुर्जे में खराबी के लिए सप्लायर के ऊपर मुकदमा चलाया जा सकता है।
कनाडा ऑपरेटर की पूरी जिम्मेदारी। आर्टिकल 10 और 11 के तहत सप्लायर की कोई जिम्मेदारी नहीं।
कैबिनेट के पास करने के बाद इस विधेयक को संसद में पेश किया जाएगा। संसद से पारित होने के बाद ये कानून बनेगा। तब जाकर भारत-अमेरिका के बीच हुआ परमाणु करार पूरा होगा। इसके बाद अमेरिकी कंपनियों को भारतीय परमाणु बाजार में कारोबार करने का मौका मिलेगा। यानी कैबिनेट की मंजूरी से एटमी सुपरमॉल में जाने का रास्ता बना है। अब हम आपको ग्राफिक्स के जरिए बताते हैं कि क्या होगा जब इस विधेयक को संसद की मंजूरी मिल जाएगी और भारत- अमेरिका न्यूक्लियर डील अमल में आ जाएगा।
न्यूक्लियर डील के क्या फायदे हैं ?
इससे ऊर्जा की बड़ी जरूरत को पूरा किया जा सकेगा
भारत को दोहरे इस्तेमाल मे काम आनेवाली तकनीक मिल सकेगी। डिफेंस, स्पेस और बायोटेक को बढावा मिलेगा।
भारत NPT से बाहर रहकर भी एटमी हथियार रख सकेगा।
भारत को सुरक्षा संबंधी सारे मापदंडों को कबूल करने की जरूरत नहीं रह जाएगी।
न्यूक्लियर कॉमर्स में भारत भी साझीदार होगा।
भारत के न्यूक्लियर फ्यूल हासिल करने लगा प्रतिबंध खत्म हो जाएगा।
फिलहाल भारत न्यूक्लियर एनर्जी का इस्तेमाल करनेवाले देशों में 27वें स्थान पर है। डील के बाद भारत में मौजूदा 4000 मेगावाट से ज्यादा का प्रोडक्शन होगा।
1974 में पोखरण धमाके के बाद से भारत पर प्रतिबंध लगाया गया। 36 साल बाद उससे बाहर आने का मौका अब मिलेगा।
दुनिया के 30 देशों में 436 रियेक्टर हैं। सवाल यह है कि क्या भारत का बिल दूसरे देशों में मौजूद कानून से अलग है, जवाब है- नहीं।

 

 

 

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