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शाह का एनकाउंटर कनेक्शन

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Sun Jul 25 2010 15:37:50 GMT+0530 (India Standard Time)

सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में अमित शाह पर इल्ज़ाम संगीन हैं। अमित शाह पर सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर मामले में शामिल होने का आरोप है। अमित शाह पर लगे आरोपों के बारे में आपको विस्तार से बताते हैं...

गुजरात में सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी एनकाउंटर का मामला रह-रहकर उठता रहता है और जब-जब इस मामले से जुड़ी कोई चीज़ बाहर आती है, वह नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबत लेकर आती है। नया खुलासा भी गुजरात सरकार के लिए एक मुसीबत है। मोदी के एक मंत्री सोहराबुद्दीन मामले में आरोपी पुलिस अधिकारियों से फोन पर उस वक़्त लम्बी-लम्बी बातें की। गुजरात के गृह राज्य मंत्री अमित शाह ने मामले आरोपी डीआईजी, डीसी वंजारा, एटीएस के एसपी राजकुमार पांडियान और बंसकांथा के डिप्टी एसपी विपुल अग्रवाल से टेलीफोन पर दिसंबर 2006 में बात की। यह वह वक़्त था जब सोहराबुद्दीन मामले में एक मात्र गवाह तुलसी प्रजापति का एनकाउंटर हुआ था।

दरअसल 26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन शेख को लश्कर का आतंकी बताते हुए मार गिराया गया था। तब यह कहा गया कि सोहराबुद्दीन शेख गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने निकला था। जिसका एनकाउंटर कर दिया गया, लेकिन बाद में यह एनकाउंटर फर्जी निकला। इसी मामले से जुड़ा एक मात्र गवाह था तुलसी प्रजापति, जिसे दिसंबर 2006 में एनकाउंटर में मार दिया गया। जाहिर है कहीं न कहीं ऐसा लग रहा था कि सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति के पास ऐसी जानकारी थी जो सरकार की जड़ें हिला सकती थी और इसीलिए दोनों को मार गिराया गया।

सितंबर 2006 से लेकर जनवरी 2007 तक गुजरात के गृह राज्य मंत्री अमित शाह ने विपुल अग्रवाल, राजकुमार पांडियान और डीसी वंजारा से लगातार फोन से सम्पर्क में थे और कॉल रिकॉर्ड बताते हैं कि उनकी तीनों पुलिस अधिकारियों से 155 मिनट की बातें हुईं।

शाह ने प्रजापति के एनकाउंट वाले हफ़्ते में तो इन अधिकारियों से बात की ही, इसके अलावा इस मामले में जब-जब कुछ हुआ तब-तब मंत्री जी ने पुलिसवालों से सम्पर्क साधा। जैसे कि 7 सितंबर, 2006 को जब सुप्रीम कोर्ट में पहली याचिका पड़ी तब शाह ने इन पुलिस अधिकारियों को 20 बार फोन किया। इसी तरह से सितंबर में अमित शाह इन्हें 28 कॉल किए। दिसंबर 2006 में 42 बार और जनवरी 2007 में 73 बार फोन किया। जून 2006 में भी शाह ने ढेरों कॉल्स की। इस वक़्त सीआईडी की आईजीपी गीता जोहरी ने सोहराबुद्दीन मामले की जांच शुरू की थी। वहीं जुलाई और अगस्त में जब सोहराबुद्दीन मामले में कुछ नया नहीं हुआ, तो इन दोनों महीनों में 4 से 9 ही कॉल किए गए।

ये फोन कॉल्स बताते हैं कि कहीं न कहीं प्रजापति को रास्ते से हटाने का पूरा खाका तैयार किया गया था। इतना ही नहीं, सिर्फ प्रजापति मामले से ही शाह का नाता नहीं जुड़ता दिख रहा। 7 अक्टूबर, 2004 से 7 मार्च, 2005 के बीच में भी अमित शाह ने राजकुमार पांडियान से 277 बार बातें की। इस दौरान सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति ने कुछ जाने-माने बिल्डरों के यहां वसूली के लिए फायरिंग की थी और इसी दौरान डीसीपी अभय चुडासमा और सोहराबुद्दीन के रिश्ते जगजाहिर हो गए थे। चुडासमा को गिरफ़्तार कर लिया गया था और तभी यह बात भी सामने आई थी कि चुडासमा के ऊपर अमित शाह का हाथ था।

अमित शाह पर अब सीबीआई का शिकंजा कसता जा रहा है। 6 महीने पहले यह जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। गृह राज्यमंत्री अमित शाह के फोन कॉल्स रिकॉर्ड गुजरात सीआईडी के एनडी सोलंकी और पुलिस कमिश्नर पीसी पांदे के आदेश पर एक मामले के मद्देनज़र ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट 2005 के तहत किए गए। शाह के लैंडलाइन 079-26404230 और मोबाइल फोन 9824010090 और 9825049392 से राजकुमार पांडियान के फोन पर सैकड़ों काल्स की गईं। दोनों के बीच में 331 मिनट बात हुई।

यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि जिस पर सोहराबुद्दीन और प्रजापति के मामले में साज़िश रचने का आरोप है और एक मंत्री के बीच में इतनी ज़्यादा बातें हुईं हैं। यह सामान्य बात भी नहीं है, क्योंकि जांच की केस डायरी के मुताबिक गृह राज्य मंत्री अमित भाई शाह और एसपी राजकुमार पांडियान के बीच हुई इतनी सारी बातें असामान्य हैं, क्योंकि एक राज्यमंत्री और एक पुलिस अधिकारी के बीच ऑफिशियल डेकोरेम के खिलाफ हैं।

हालांकि जिस मामले में अमित शाह के फोन रिकॉर्ड किए जा रहे थे वह 2009 में ही बंद हो गया, लेकिन इन रिकॉर्ड्स ने नए राज़ खोल दिए हैं। जिसमें नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्री जी बुरी से फंसे हुए दिखते हैं। अमित शाह की ताक़त का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जब-जब किसी पुलिसवाले ने आवाज़ उठाने की कोशिश की उसकी आवाज़ को दबा दिया गया।

सोहराबुद्दीन का मामला उठने पर अमित शाह के इशारे पर एडिशन डीआईजी रजनीश राय को इसकी ज़िम्मेदारी दी गई थी, लेकिन 2007 में राय ने बड़ा क़दम उठाते हुए पांडियान, वंज़ारा और विपुल अग्रवाल को गिरफ़्तार किया। यह शाह के लिए ख़तरनाक होने लगा था और शायद रजनीश को सोहराबुद्दीन मामले में ज्यादा कुछ पता चल गया था। लिहाज़ा उनसे यह केस छीन लिया गया और सीआईडी की आईजीपी गीता जौहरी को केस सौंप दिया गया।

यह भी कहा जाता है कि जब गीता जोहरी ने सोहराबुद्दीन मामले में अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी, जो अमित शाह ने एक बैठक में कहा कि तुम लोग मेरे लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हो और ऐसा इसलिए हुआ था, क्योंकि इससे ठीक पहले सीआईडी उस फार्महाउस की छानबीन की थी जहां वंजारा ने सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी को एनकाउंटर से पहले रखा था।

इसके बाद से ही सोहराबुद्दीन के मामले में सीआईडी बिल्कुल ठंडी पड़ गई। ज़ाहिर है यह साज़िश बेहद गहरी थी। कुछ बड़ा है जिसकी जानकारी सोहराबुद्दीन और प्रजापति को थी और इसीलिए उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया।

 

 

 

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