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धोखा बंद का...

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Tue Sep 07 2010 21:39:12 GMT+0530 (India Standard Time)

आज की परिस्थिति में सबसे बड़ा हथियार बन चुका है हड़ताल। चाहे वह राजनीतिज्ञ हों, कर्मचारी हों, अधिकारी हों, मज़दूर हों या फिर कामगार हों, हर किसी के लिए ये वह हथियार है जिसका इस्तेमाल सरकार के ख़िलाफ़ करते हैं। लेकिन इस हथियार की मार सबसे ज़्यादा पड़ती है आम आदमी पर। जो हर क़दम पर बंद और हड़ताल का ख़ामियाज़ा भुगतने को मजबूर होता है। असहयोग के नाम पर यह अपने ही लोगों के साथ धोखा है। उनके साथ धोखा है जो इस व्यवस्था पर निर्भर करते हैं। जो इस व्यवस्था पर भरोसा करते हैं।

सबसे पहले जोधपुर की बात करते हैं जहां डॉक्टरों ने काम बंद किया तो ज़िंदगियां दम तोड़ने लगीं और कुछ घंटों की हड़ताल कई परिवारों के लिए ज़िंदगी भर का ग़म दे गई। जिनके हाथों में हमें ज़िंदगी का भरोसा दिखता है, जिन पर हम ऊपरवाले से ज़्यादा भरोसा कर लेते हैं आज उन्ही हाथों ने मौत की कहानियां लिख दी है। उनकी अपनी ज़िद थी, सरकार से कुछ नाराज़गी थी, लेकिन जब वे नारे लगा रहे थे तो उनकी चौखट पर ज़िंदगियां दम तोड़ रही थीं। जोधपुर की आशा अब इस दुनिया में नहीं है। उसके घरवालों के पास अब आंसू बहाने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। छोटे- छोटे बच्चों को पता नहीं मां कहां चली गई है। पति बदहवाश है। उसने जिन पर भरोसा कर अपनी जीवनसाथी की ज़िंदगी सौंपनी चाही उन्हीं के इनकार ने उसकी आशा को छीन लिया। महेश रोता रहा, गिड़गिड़ाता रहा, सास भी अपनी बहू के लिए गिड़गिड़ाई। डॉक्टरों से आशा के लिए ज़िंदगी मांगते रहे और डॉक्टर मुंह फेरकर खड़े तमाशा देखते रहे।

आशा की तबियत अचानक बिगड़ गई थी उसे वेंटिलेटर की ज़रूरत थी, लेकिन कोई नहीं था जो उसे वेंटिलेटर की सर्विस देता। जिसके सामने भी इन्होंने अपना दुखड़ा रोया, सब खामोश रहे और उनकी खामोशी आशा को हमेशा के लिए खामोश कर गई। महात्मा गांधी अस्पताल में आशा को देखने तक से इनकार कर दिया गया, फिर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल चक्कर लगाते रहे। नहीं कुछ हासिल हुआ तो सोचा कि एम्बुलेंस से किसी और अस्पताल ले जाएं, लेकिन कोई एम्बुलेंस तक देनेवाला नहीं। यह उस हड़ताल की सच्चाई है जिसकी वजह से 40 से ज़्यादा जानें चली गईं। डॉक्टर्स को अपना गुस्सा सरकार को दिखाना था, लेकिन उसका खामियाज़ा कई परिवार झेल रहे हैं। जिनके घर से किसी का बेटा, तो किसी की मां, किसी का भाई तो किसी की पत्नी इस हड़ताल की वजह से दुनिया छोड़ चले। क्या हड़ताल की आड़ में डॉक्टर्स इस गुनाह को कहीं छिपा पाएंगे ? हालांकि तीन दिनों तक हड़ताल पर रहने के बाद डॉक्टर काम पर वापस लौट आए।

मौका जनता की भावनाओं से जुड़ा था लिहाज़ा राजनेता अपनी सियासत से पीछे नहीं हटे। लेकिन डॉक्टरों के काम बंद से जो 60 मौतें हुई हैं उसे लेकर न डॉक्टर्स के पास जवाब है और न ही राजनेताओं के पास। राजस्थान में डाक्टरों की हड़ताल से परेशान मरीजों के लिए राहत की खबर तब आई जब डॉक्टर हड़ताल को खत्म करने पर राजी हो गए। अब एक कमेटी डाक्टरों की मांगों पर विचार करेगी। तीन दिन तक जिद्द पर अड़े हड़ताली डाक्टरों ने अब भले ही नरमी दिखाई हो लेकिन उनकी जिद की वजह से करीब 60 लोगों को इलाज नहीं मिला और उनकी मौत हो गई। सरकार भी मौत के बढ़ते आंकड़ों से बेखबर बनी रही और डाक्टरों को भगवान मान कर मान मनौव्वल में लगी रही। उधर मौत के बढ़ते आंकड़ों को देखकर अब तक बेखबर बने रहे राजनीतिक दल के नेताओं ने भी मौके का फायदा उठाया और जमकर राजनीतिक रोटियां सेंकी। लेकिन यह अलग बात है कि इससे मरीजों को कोई राहत नहीं मिल पाई।

डाक्टरों की यह कोई पहली हड़ताल नहीं है। लेकिन इस बार मौत का जो कहर 60 लोगों पर टूटा है, उसने लोगों को यह सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया है कि डाक्टर कम से कम भगवान कहे जाने के तो काबिल नहीं ही हैं। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भी डाक्टर्स ने काम बंद कर दिया। वजह सुरक्षा की कमी और आए दिन मरीज़ों के परिजनों से होनेवाली झड़प, लेकिन डाक्टरों की इस हड़ताल की वजह से इलाज न मिलने से एक मरीज़ को मिली मौत। राजधानी का प्रतिष्ठित सफदरजंग अस्पताल में किसी तरह से मरीज़ पहुंच रहे हैं इलाज के लिए। लेकिन उनको अस्पताल में घुसने तक नहीं दिया जा रहा। ज़्यादातर मरीज़ अस्पताल के बाहर ही पड़े हैं।

कुछ स्ट्रेचर पर लेटे हुए और कुछ ज़मीन पर ज़िंदगी की जंग लड़ रहे हैं। वजह यह कि सुरक्षा को लेकर डाक्टर हड़ताल पर चले गए हैं। वे अब किसी का इलाज तब तक नहीं करेंगे, जब तक कि सरकार उन्हें माकूल सुरक्षा मुहैया नहीं करा देती। एम्स के बाद दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल की ऐसी हालत है। डाक्टरों के मुताबिक आए दिन मरीज़ों के परिजनों से झगड़ा होता है और ऐसे माहौल में काम नहीं किया जा सकता। लेकिन इस हड़ताल का असर देखिए, एक मरीज़ को अस्पताल में बिस्तर तो मिला लेकिन इलाज नहीं मिला। जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई।

डाक्टरों की कमी का होना अपनी जगह पर सही ज़रूर है, लेकिन सरकारी हॉस्पीटलों में डाक्टरों का रवैया भी किसी से छिपा नहीं है। कसूर चाहे किसी का हो खामियाजा इन मरीजों को ही भुगतना होता है। हालांकि फिलहाल सफदरजंग हास्पीटल में आईटीबीपी के जवानों को तैनात कर सुरक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने की कोशिश की गई है। पूरे देश में 9 ट्रेड यूनियन हड़ताल पर थे। उसका असर दिल्ली में यह रहा कि दुनिया के कोने- कोने से दिल्ली आनेवाली करीब 70 फ्लाइट्स रद्द हो गई। ऑटो वाले हड़ताल पर रहे। यात्रियों को परेशानी हुई और बैंक और बीमा कम्पनीवालों ने अपना शटर डाउन रखा। देश की राजधानी में ट्रेड यूनियन की हड़ताल का बहुत ज़्यादा असर नहीं रहा, लेकिन तमाम बैंकों में कामकाज बंद रहा। एटक महासचिव गुरुदास दासगुप्ता ने सैकड़ों समर्थकों के साथ आरबीआई बिल्डिंग के सामने धरना दिया, जिसमे बीमा और बैंककर्मी शामिल थे।

देश के 9 प्रमुख मज़दूर संगठनों ने हड़ताल सरकार की आर्थिक नीति के खिलाफ बुलाई है। लेफ़्ट पार्टियों ने सरकार के ख़िलाफ़ महंगाई को लेकर मोर्चा खोला है जिसमें कर्मचारी संगठन उनका साथ दे रहे हैं। सभी कर्मचारियों की छंटनी का विरोध कर रहे हैं, ट्रेड यूनियन क़ानून के उल्लंघन को लेकर सड़क पर उतरे हैं और सरकार की विनिवेश नीति को लेकर भी ख़फ़ा हैं। लेकिन दिल्ली में बैंक और बीमा कम्पनियों की हड़ताल का उतना असर नहीं हुआ। कुछ आटो यूनियन हड़ताल पर रहे, जिसकी वजह से राजधानी की सड़कों पर लोग परेशान होते रहे। ख़ासकर दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मुसाफिरों का ख़ासी दिक्कतें झेलनी पड़ीं। ऑटो चालकों की अपनी अलग मांग है जिसे लेकर वे 24 घंटे की हड़ताल पर चले गए। ऑटो चालक चाहते हैं कि पुराने बायोमेट्रिक लाइसेंस को ही वैध माना जाए, क्योंकि नए लाइसेंस के लिए उन्हें 400 रुपए की फीस देनी होगी और 4 दिन की ट्रेनिंग की वजह से उनकी कमाई भी मारी जाएगी। अधिकारियों की रिश्वत अलग।

मुंबई में भी इस महाहड़ताल का असर अच्छा ख़ासा रहा। मुंबई आने वाली करीब 100 फ्लाइटें रद्द हुईं। वहीं मुंबई से जानेवाली कुछ प्लाइट्स पर भी असर पड़ा। ऑटोवाले तो सड़क पर उतरे ही नहीं, दिन भर आम आदमी परेशान होता रहा। देश में महाहड़ताल, परेशान हुई मायानगरी, सड़क से लेकर हवा तक सबकी रफ़्तार थम गई। ट्रेड यूनियन की हड़ताल ने देश की आर्थिक राजधानी का हाल बुरा कर दिया। सड़कों पर लोग ऑटो और टैक्सी के लिए परेशान होते रहे और मुंबई के हज़ारों ऑटो सड़क के किनारे खड़े रहे। कुछ इलाकों में टैक्सियां चलती रहीं, लेकिन ऑटो रिक्शावालों ने तो चक्का जाम कर के रखा।

सोमवार रात 12 बजे ही सड़कों पर यूनियन के लोग उतर गए और सभी ऑटोवालों को रोककर हड़ताल में शामिल करते गए। ऑटोवालों ने अपने रिक्शों पर लेफ़्ट के झंडे लगा लिए और इनकी मांग थी कि सीएनजी और पेट्रोल- डीज़ल के दाम कम करें। इसके अलावा हड़ताल की वजह से हवाई उड़ान पर भी असर पड़ा और मुंबई आने वाली और यहां से जानेवाली कई फ्लाइट्स को रद्द कर दिया गया। मज़दूर संगठन भी सड़कों पर उतरे और सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चाबंदी की। लोग सरकार की आर्थिक नीतियों और महंगाई को लेकर विरोध कर रहे थे। ट्रेड यूनियन की हड़ताल में बैंक और बीमाकर्मी भी शामिल थे। साथ ही बीएमसी के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी भी इसका समर्थन कर रहे थे।

 

 

 

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